रिश्तों में समर्पण
रिश्तों में समर्पण अचानक से उसको देखते ही मेरे मस्तिष्क की सारी ऊर्जा जैसे 5 साल पीछे चली गई हो , मेरा शरीर वहीं था पर मेरी आँखों के सामने वो सारे अनगिनत चित्र घूम रहे थे जिनमें मैंने अपने भविष्य के सपने संजोयें थे और समय के साथ उनको सहेज कर अपने अंदर के किसी शांत कमरे की पुरानी अलमारी मैं समेट दिया था । कभी सोचा नही था कि पूनम यूँ इस तरह दोबारा आकर मेरे मन के शांत सागर में लहरों के ज्वालामुखी को फिर से प्रस्फुटित कर देगी। मैं यानि प्रशांत , अब बहुत दूर निकल आया था उन सारे रिश्तों से जिनको कभी अपने आप से भी ज्यादा प्यार किया , सम्मान दिया पर संपूर्णता की दहलीज पर नही ले पाया और तब माना कि ये डोर वाकई में किसी के पास है जो ये निर्धारित करता है कि किसके लिए क्या लिखा है विधाता ने उसको वहीं देना है । पर मन हैं कि विचलित रहता है आकांक्षाओं के घोड़े पर सवार वो तो बस ...