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हौंसला

वो आने वाली किलकारी की आवाज़ें राज के ज़हन में जाने कब से गूंज रही थी, वो एक पल का इंतज़ार था कि मानो सदियाँ निकल गयी हो कि जिस दिन उसे कोई आ कर कहेगा कि तुम पापा बन गए हो ,राज को न जाने क्यों ऐसा लगता था  कि जल्दी से वो सपना पूरा हो और एक मेहमान जिसका इंतज़ार राज और स्मिता कर रहे है वो बस आ जाये, आखिर वो इंतज़ार की घड़ियां खत्म हुई और तय वक़्त पर मेहमान ने एक नन्ही परी  के रूप में प्रवेश लिया, राज और स्मिता के लिए तो जैसे सारा जहां एक चेहरे में समा गया हो, वो  चेहरा जिसका इंतज़ार वो जाने कितनी रातों से कर रहे थे, चूंकि उनके जीवन मैं वो ख़ुशी नवरात्र के दिनों मैं आयी थी इसीलिए दोनों ने अपने उसका नाम वैष्णवी रखा था  समय बीता,  धीरे धीरे राज और स्मिता भी अपनी जिंदगी मैं लौटने लगे थे  क्योंकि हर संतान की शुरुवाती परवरिश जिम्मेदार माता पिता के समर्पण  और जिम्मेदारियां के सही निर्वहन पर आधारित होती है  और इसी के  कारण   जीवन थोड़ा अस्त व्यस्त हो जाता है ,एक दिन राज को कुछ आभास हुआ की वैष्णवी की आँखें एक जगह नहीं टिकती हैं और उसने स्मिता को इस बारे...

रिश्तों में समर्पण

  रिश्तों में समर्पण अचानक से उसको देखते ही मेरे मस्तिष्क की सारी ऊर्जा जैसे 5 साल पीछे चली गई हो , मेरा शरीर वहीं था पर मेरी आँखों के सामने वो सारे अनगिनत चित्र घूम रहे थे जिनमें मैंने अपने भविष्य के सपने संजोयें थे और समय के साथ उनको सहेज कर अपने अंदर के किसी शांत कमरे की पुरानी अलमारी   मैं समेट दिया था  ।   कभी सोचा नही था कि पूनम यूँ इस तरह दोबारा आकर मेरे मन के शांत सागर में लहरों   के ज्वालामुखी को फिर से प्रस्फुटित कर देगी।  मैं  यानि   प्रशांत , अब बहुत दूर निकल आया था उन सारे रिश्तों से जिनको कभी अपने आप से भी ज्यादा प्यार किया ,  सम्मान दिया   पर संपूर्णता की दहलीज पर नही ले पाया और तब माना कि ये डोर वाकई में किसी के पास है जो ये निर्धारित करता है कि किसके लिए क्या लिखा है विधाता ने उसको वहीं देना है ।  पर मन हैं कि विचलित रहता है आकांक्षाओं के घोड़े पर सवार वो तो बस ...