इंतज़ार......

 जाने कितनी रातें वो इसी एहसास में काट रही थी कि जो गया है वो लौट कर आएगा, वो दिन था कि साक्षी अपने हर एक पल को पकड़ कर रखना चाह रही थी , श्लोक उस दिन सऊदी अरब जा रहा था उसकी एक तेल कंपनी में नौकरी लग गयी थी और वो ये बोल के जा रहा था कि सब कुछ व्यवस्थित करते ही वो वापिस लौट कर आएगा और शादी कर के साक्षी को हमेशा के लिए साथ ले जाएगा  

उसके जाने के बाद साक्षी ने भी अपने को काम में झोंक दिया था , साक्षी जब भी पलट के देखती थी तो सुनहरी यादों के पन्ने उसकी आँखों के सामने खुलते जाते थे , श्लोक से मिलना संयोग नही था , जिस शादी में जाने के लिए उसने अपने माता पिता को 2 महीने पहले मना रखा था आखिरी में उसी शादी में उसको मजबूरन जाना पड़ा और वहीं उसकी श्लोक से मुलाक़ात हुई

साक्षी वैसे भी इस शादी में अनमने मन से आयी थी उसका  कारण था की वहां वो किसी को जानती नहीं थी और इसीलिए सबसे दूर अलग कुर्सी पर बैठ कर होने वाले रीति रिवाजों को गौर से देख रह थी, अचानक उसे एहसास हुआ की दो अनजान आंखें उसे लगातार देख रही है पहले तो साक्षी ने सोचा की उसको बुला कर अलग से समझाए पर फिर उसने सोचा की बात को तूल देने से अच्छा है की चुपचाप शादी निबटाएं और कल तो वैसे भी निकल ही जाना है कौन यहाँ जिंदगी काटने आया है वैसे भी ऐसे किस्से तो शादी ब्याह मैं होते रहते हैं 


पर जैसे कमल ठहरे हुए पानी मैं खिलता है वैसी ही हर इंसान के जीवन मैं जब एक ठहराव आता है तभी जिंदगी एक नया अध्ययाय लिखती है , ये शायद साक्षी की ज़िन्दगी का वो ही ठहराव था  दूसरे दिन अचानक से उन अनजानी आँखों ने अपना परिचय दिया और कहा मैं श्लोक और आपका नाम क्या है , साक्षी चाहते हुए भी पता नहीं क्यों एक अलग सा खिचाव महसूस कर रही थी और पूरी ताक़त से अपने ज़हन मैं उमड़ने वाली जज्बातों की आंधी को रोकना चाह रही  थी पर ऐसा हो सका और वो बोली मैं साक्षी !

कल आप को अपनी तरह अकेला पाया तो लगा क्या आज हम एक दूसरेके साथ अपना अकेलापन दूर कर सकते है अगर आप चाहो हो तो ? साक्षी ने फिर अपने आप को रोकने की कोशिश की पर वो बवंडर थमने नाम नहीं ले रहा था और साक्षी बोली की आपको कैसे पता मैं अकेली हूँ , श्लोक बोला की भीड़ के साथ हो कर भी हम तन्हा हों सकते हैं और इसको पढ़ने वाला भी वो ही हो सकता है जो उस तन्हाई का शिकार हो , साक्षी को श्लोक की बातों से लगने लगा था की उसमें गहराई है वो सतही बातें नहीं कर रहा  

धीरे धीरे दोनों ने एक दूसरे  बारे  मैं जाना और ऐसा लगने लगा की बहुत पहले से एक दुसरे के बारे मैं जानते हैं वैसे भी एक दूसरे को समझने के लिए सदिओं का परिचय नहीं विचारो का क्षणिक आदान  प्रदान ही बहुत होता है  उस शादी से लौटने के बाद तो जैसे साक्षी की दुनिया ही बदल गयी हो , हर वो चीज़ उसे अच्छी लगने लगी जो पहले उसको बहुत बोरिंग लगती थी 


समय बीता और दोस्ती प्यार मैं बदल गयी , एक दुसरे को जीवन साथी बनाने का फैसला कर लिया , पर अचानक से एक मोड़ आया और श्लोक नौकरी लिए दुबई चला गया , साक्षी हर दिन उस से बात करती उसकी दिनचर्या पूछती और जानने की कोशिश करती की श्लोक आखिर कब तक लौटेगा पर  शायद उसके तेल कंपनी के साथ किये गए करार मैं इतना जल्दी लौटना संभव नहीं था  

साक्षी को हमेशा एक डर लगा रहता था की क्या दूरियां सच्चे प्यार को कम कर सकती हैं ? क्या ये अंतराल उनके बीच इस बंधन को ढीला कर सकता है? सोच सोच कर साक्षी परेशान हो जाती थी पर अगले ही पल उसे लगता था कि उसे ऐसा शक नहीं करना चाहिए पर कुछ दिनों से होने वाला एक एहसास उसकी इस शंका को गहराता जा रहा था , अब पहले की तरह श्लोक ने वीडियो कॉल पर  पर आना कम कर दिया  था यहाँ तक की अब वो फ़ोन पर भी झुंझलाकर ही बात करता था , अपनी बेस्ट फ्रेंड निवेदिता को जब उसने ये बात बताई तो उसने कहा की काम का  बोझ और अपनों से दूर रहने के कारण भी अक्सर ऐसा होता है तू परेशान मत हो । 

समय बीतने के साथ अब श्लोक उस से केवल औपचारिक बातें ही करने लगा था और साक्षी को ये एहसास होने लगा था की कुछ तो गलत हो रहा है , एक दिन वो भी आया जिस दिन श्लोक साल बाद इंडिया लौट रहा था , साक्षी के लिए तो जैसे वो रात दिवाली और दिन होली था , जाने क्या क्या नहीं सोचा था, भाव थे की संभल नहीं रहे थे , आंसू थे की रुक नहीं रहे थे , हर साँस मैं दीवानगी थी , फ्लाइट आने घंट पहले  से एयरपोर्ट पर श्लोक का इंतज़ार कर रही  साक्षी के लिए दीवानेपन और पागलपन के अंतर को समझ पाना उस दिन बहुत मुश्किल था , आखिर फ्लाइट की उदघोषणा के साथ ही बरबस साक्षी की आंखें उस दरवाज़े पर टिकी के जैसे पथरा गयी होश्लोक जैसे ही उस दरवाजे से बाहर आया साक्षी दीवानों की तरह हाथ हिलाने लगी और श्लोक ने उसको देख कर भी ऐसी प्रतिक्रिया दी जैसे वो उसे नजरअंदाज कर रहा हो   लगेज बेल्ट से सामान उठाने के बाद जैसे ही श्लोक एयरपोर्ट लाउंज में आया साक्षी उस से लिपट गयी पर श्लोक ने एक नाकाम सी  भी कोशिश  नहीं की कि अपने हाथों का सामान छोड़ कर उसे बाँहों मैं भर ले पर साक्षी को इससे कोई मतलब नहीं था वो उसको गले लगाए रही , फिर एक मीठी से आवाज ने साक्षी का ध्यान तोड़ाअच्छा  ये हैं वो आपकी सबसे अच्छी दोस्तएक बहुत ही खूबसूरत  नवेली दुलहन के लिबास  मैं युवती ने मुस्कुरा कर श्लोक से पूछा   साक्षी के तो जैसे सारे शब्द ही गले में अटक गए हो , उसने कपकपाती  आवाज मैं पूछा आप कौन, वो बोली मैं अर्चना कभी श्लोक ने मेरे बारे मैं आपको नहीं बताया , ये तो आपके बारे मैं हमें सब बता चुके , श्लोक की तरफ प्रश्नवाचक भाव से घूम कर साक्षी ने देखा तो श्लोक बोला अभी  घर चलते हैं मैं बहुत थका हुआ हूँ पर साक्षी को अब तक समझ  चुका थापर खुशी में  वो इतने आंसू बहा चुकी थी की दुःख के आंसुओं के लिए आँखों का दरिया सूख चूका था, श्लोक वहाँ से अपन पत्नी के साथ जा चुका था , शून्य में खड़ी   साक्षी के लिए समझ नहीं रहा था की किस बात की सजा उसे मिली क्या सच्चा प्यार करने की ? या वाकई मैं दूरियों मैं इतनी ताक़त होती है की वो भावनाओं के समंदर को इस तरह से सुखा सकती हैं ! क्या समर्पण की परिभाषा बदल चुकी है ? क्या विश्वास अपने मायने खो  चुका है ? , इन्ही अनगिनत प्रश्नों साथ छोटे छोटे कदम बढाती साक्षी चल पड़ी थी  उस राह की तरफ जहाँ उसे शायद अपनी ज़िन्दगी फिर से प्रथम पृष्ठ से शुरू करनी थी  


(साक्षी की ये कहानी उन बहुत से ऐसे लड़के लड़कियों के लिए प्रेरणा है जिन्हें ज़िन्दगी मैं प्रेम होता है पराकाष्ठा तक जाता है असफल हो जाता है पर वो  हिम्मत नहीं हारते क्योंकि प्रेम जीवन का हिस्सा है उसको पाना और खोना मायने नहीं रखता जितना प्रेम मैं जीना मायने रखता है )



-राहुल गोविला-

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