रिश्तों में समर्पण
रिश्तों में समर्पण
अचानक से उसको देखते ही मेरे मस्तिष्क की सारी ऊर्जा जैसे 5 साल पीछे चली गई हो, मेरा शरीर वहीं था पर मेरी आँखों के सामने वो सारे अनगिनत चित्र घूम रहे थे जिनमें मैंने अपने भविष्य के सपने संजोयें थे और समय के साथ उनको सहेज कर अपने अंदर के किसी शांत कमरे की पुरानी अलमारी मैं समेट दिया था ।
कभी सोचा नही था कि पूनम यूँ इस तरह दोबारा आकर मेरे मन के शांत सागर में लहरों के ज्वालामुखी को फिर से प्रस्फुटित कर देगी। मैं यानि प्रशांत,अब बहुत दूर निकल आया था उन सारे रिश्तों से जिनको कभी अपने आप से भी ज्यादा प्यार किया, सम्मान दिया पर संपूर्णता की दहलीज पर नही ले पाया और तब माना कि ये डोर वाकई में किसी के पास है जो ये निर्धारित करता है कि किसके लिए क्या लिखा है विधाता ने उसको वहीं देना है। पर मन हैं कि विचलित रहता है आकांक्षाओं के घोड़े पर सवार वो तो बस दौड़ना चाहता है, पाना चाहता है हर वो सब कुछ जिसका शायद वो केवल मुसाफिर भर है ।
प्रशांत ने जब कॉलेज में एडमिशन लिया तो भविष्य को लेकर हज़ारों सपने थे और युवा अवस्था की दहलीज़ पर होने के कारण वो सारी उमंगे भी थी जो किसी भी लड़के में होती है, क्लास में घुसते ही नज़र जैसे एकटक हो गई हो , पूनम की छवि प्रशांत के सामने एक पावन और पवित्र रिश्ते की शुरुआत के रूप में हुई उसने उसी पल में जैसे आगाज़ से अंजाम तक का सफर पूनम के साथ तय कर लिया हो। क्लास में परिचय सत्र के दौरान उसे पूनम का नाम मालूम पड़ा। उसकी नज़रों ने जैसे एक।ही दिन में उसको पढ़ने की ठान ली हो। प्रशांत उसके बारे में हर बात जानना चाहता था जैसे कि उसका परिवार में कौन कौन है , कहाँ रहती है पहले किस स्कूल में पढ़ती थी और जानना कोई मुश्किल भी नही था क्योंकि प्रशांत की एक कजिन सिस्टर उसी क्लास में थी।
धीरे धीरे समय बीतने लगा पर प्रशांत की तरफ पूनम का ध्यान नही था। उसकी कजिन उसे बता चुकी थी कि पूनम भविष्य निर्माण को लेकर बहुत संजीदा है और उसके ऊपर परिवार का बहुत दबाव है पर प्रशांत ने धीरे धीरे अपनी अन्य प्रतिभाओं जैसे बात करने का तरीका, हंसी मजाक, कविताओं और गाने गाना आदि से पूनम को अपनी तरफ आकर्षित करना शुरू कर दिया था। धीरे धीरे वो दिन भी आ गया जिस दिन प्रशांत ने इजहार कर दिया पर पूनम ने केवल दोस्ती का हवाला देकर सबंधों से किनारा करने की कोशिश की और प्रशांत ने उसको मना भी नही किया क्योंकि वो जानता था कि समझौते और जबरदस्ती से सबंधों को केवल निभाया जा सकता है , अपनाया नही जा सकता ।
आखिर वो दिन आ ही गया जब दोनों ने अपने को एक दूसरे के रूप में परिभाषित कर दिया। अब बस मैनेजमेंट की पढ़ाई का आखरी साल था और प्रशांत को को एक अच्छी नौकरी की तलाश थी ताकि वो अपने को पूनम के घरवालों के सामने एक स्थापित जीवन साथी के रूप में प्रस्तुत कर सके पर दोनों ने ये भी तय किया था कि आखिरी कोशिश तक जाएंगे लेकिन माता पिता की रजामंदी के बगैर शादी नहीं करेंगे, एक सपना पूरा करने के लिए माँ बाप के सपने को नही कुचलेंगे, होनी को को भी शायद वो ही मंज़ूर था और पूनम के घरवालों ने इस रिश्ते के लिए मना कर दिया, शायद वो कहीं और बहुत पहले जबान दे चुके थे या ये कहे कि पूनम को अपने जबानरुपी यज्ञ में आहूत कर चुके थे।
प्रशांत और पूनम का संकल्प और इच्छाशक्ति ने उनको मां बाप के फैसले के विरुद्ध नहीं जाने दिया , अविरल अश्रु धाराओं ने जैसे सारे सपनो को धो ही नहीं दिया बल्कि गला दिया हो, प्रशांत ने जब पूनम के हाथ को जब अंतिम बार थामा तो ऐसे थामा जैसे उस हाथ की गर्माहट को वो जिंदगी भर महसूस कर सके, उसने जब पूनम को आखरी बार भरी आँखों से निहारा तो वो ऐसे निहारा की वो मंज़र उसकी आँखों से कभी ओझल न हो और जब आखरी बार सीने से लगाया तो ऐसे लगाया कि
वो भार उसके सीने से कभी खत्म न हो ।
अपने उसी संकल्प और पूनम के माता पिता को दिए वचन के कारण प्रशांत ने वो शहर
छोड़ दिया, एक अच्छी जगह नौकरी लग गई, 5 साल बीत गए अपनी कजिन से उसे पता चला कि पूनम की शादी 3 साल पहले किसी आर्मी अफसर से हो गई थी पर प्रशांत एक बहुत दृण निश्चय वाला लड़का था उसने कभी पलट कर भी नही देखा क्योंकि वो जनता था कि जो रिश्ता आज भी एक तरफ से जिंदा रखें हुए है उसको पलट के देखने या याद करने का नाम देकर वो मार नही सकता।
दोनों ने जब एक दूसरे को देखा तो जैसे शब्दों का अकाल पड़ गया हो। उन सूखी आँखों में जैसे सैलाब आ गया हो । पर वो सैलाब केवल वो दोनों एक दूसरे की आंखों में देख सकते थे। अपने को चेतना में लाते हुए प्रशांत ने पूनम से पूछा तुम इस शहर में और पूनम ने जवाब में केवल प्रशांत को भरी आँखों से साथ चलने के लिये कहा ,पूनम के घर पहुच कर उसने बताया कि उसके पति शादी के एक साल बाद ही बॉर्डर पर शहीद हो गए थे और उनकी जगह पर एक साल बाद उसको इस शहर में पोस्टिंग मिली है।
प्रशांत को बहुत अफसोस हुआ क्योंकिं उसने सपने में भी ऐसा नहीं सोचा था, उस दिन पूनम के घर से आने के बाद वो सीधा पूनम के माता पिता से मिला और उनको बोला कि वो आज भी पूनम को अपनी जीवन संगिनी बनाना चाहता है, अपनी बेटी की पसंद पर नाज़ करते हुए पूनम के माता पिता रोने लगे और प्रशांत से माफी मांगने लगे तब प्रशांत ने कहा कि आपसे मुझे न तब गिला था न आज है, वो एक समय था जो मेरे लिए नही था पर आज ईश्वर ने मेरा समय मुझे वापिस दिया है और अब मैं उस समय के साथ जीना चाहता हूँ आज प्रशांत और पूनम एक सफल वैवाहिक जीवन गुजार रहे हैं पर हम उनके जीवन से दो बातें सीख सकतें हैं कि
1, अपने सपनो को पूरा करने के लिए दूसरों के सपनो को नही कुचलना चाहिए
2
जिसको भी आप चाहो शिद्दत और समर्पण की भावना से चाहो तो विधाता, कुदरत, शक्ति या भगवान जो भी नाम आप दो वो आपके लिए रास्ते बनाता है
-राहुल गोविला-
बहुत खूब लिखा एक अच्छी शुरुआत के साथ बहूत बहुत सुभकामनाये
ReplyDeleteBohot khoobsurat bhaiya ❤️ ...
ReplyDeleteThank U
DeleteSuch a beautiful lines ❤️❣️😍
ReplyDeleteNicely written at your first attempt....
ReplyDeleteJabardast ....🎉
ReplyDeleteVery well written Bhai...
ReplyDeleteThanks, bhai
Deleteजब कोई व्यक्ति सामान्यता लेखन की शुरुआत करता है तो वह उन्हीं पहलुओं को छूता है जो उसके जीवन में घटित होते हैं तत्पश्चात लेखन में परिपक्वता एवं कल्पनाशीलता उत्पन्न होती है व्याकरण विद्वानों के लिए मायने रखता है शब्दों की सार्थकता लेखक और पाठक के अंतर को कम करने में है आपके प्रयास काबिले तारीफ है आपका शब्द चित्रण महत्वपूर्ण है प्रयास जारी रखें
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद, कृपया अपने परिचाय दीजिये, उत्साह वर्धन के लिए आभार
Deleteराहुल भाई टिप्पणी करने के पश्चात मैं अपनी कोई पहचानना दे पाया था
Deleteतुम्हारा मित्र प्रदुमन सचदेवा
DeleteVery good
DeleteSabi kha hai.... Mere liye bhi pyaar ka doosra naam tayag aur samarpan hi hai
ReplyDeleteJi
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