हौंसला


वो आने वाली किलकारी की आवाज़ें राज के ज़हन में जाने कब से गूंज रही थी, वो एक पल का इंतज़ार था कि मानो सदियाँ निकल गयी हो कि जिस दिन उसे कोई आ कर कहेगा कि तुम पापा बन गए हो ,राज को न जाने क्यों ऐसा लगता था  कि जल्दी से वो सपना पूरा हो और एक मेहमान जिसका इंतज़ार राज और स्मिता कर रहे है वो बस आ जाये, आखिर वो इंतज़ार की घड़ियां खत्म हुई और तय वक़्त पर मेहमान ने एक नन्ही परी  के रूप में प्रवेश लिया, राज और स्मिता के लिए तो जैसे सारा जहां एक चेहरे में समा गया हो, वो  चेहरा जिसका इंतज़ार वो जाने कितनी रातों से कर रहे थे, चूंकि उनके जीवन मैं वो ख़ुशी नवरात्र के दिनों मैं आयी थी इसीलिए दोनों ने अपने उसका नाम वैष्णवी रखा था 

समय बीता,  धीरे धीरे राज और स्मिता भी अपनी जिंदगी मैं लौटने लगे थे  क्योंकि हर संतान की शुरुवाती परवरिश जिम्मेदार माता पिता के समर्पण  और जिम्मेदारियां के सही निर्वहन पर आधारित होती है  और इसी के  कारण   जीवन थोड़ा अस्त व्यस्त हो जाता है ,एक दिन राज को कुछ आभास हुआ की वैष्णवी की आँखें एक जगह नहीं टिकती हैं और उसने स्मिता को इस बारे मैं बताया पर स्मिता ने उसको बहुत हल्के मैं लेते हुए और हँसते हुए कहा की हर बच्चे की आँखें ऐसी ही होती है और वो पहचानने की कोशिश करता है  क्या तुममे कभी किसी के बच्चे नहीं देखे , स्मिता को इतना आश्वस्त देख कर राज को लगा की वो तो वाकई इस बारे मैं कुछ नहीं जानता और एक दिन आया की वैष्णवी का कॉलोनी के एक प्ले ग्रुप स्कूल मैं दाखिला करा दिया जैसे की अमुमन होता है ताकि बच्चे को स्कूल मैं बैठने और माता पिता से थोड़ा अलग होने की आदत बन सके 

एक रोज स्कूल से राज के पास फ़ोन आया और उसे स्कूल मैं बुलाया गया , वहां पंहुचा तो उसने देखा की वैष्णवी को स्कूल के बाहर एक बॉउंड्री मैं वह स्कूल की बाई के साथ खेल रही है ये देखना उसके लिए आश्चर्य का विषय था क्योंकि हर बच्चा स्कूल के अंदर किसी न किसी  गतिविधि मैं सलंग्न था , उसने प्रिंसिपल के पास जा कर पूछा की उन्होंने वैष्णवी को  दुसरे बच्चों से अलग क्यों  किया हुआ है , प्रिंसिपल ने थोड़ा विस्मित होते हुए राज को बैठने को कहा और पूछा की वैष्णवी का व्यवहार क्या हमेशा आक्रोशित रहता है और वो दूसरे बच्चों  के साथ लड़ती झगड़ती है , इस पर राज ने हसते हुए कहा की इसमें कौन सी नयी बात है बच्चे तो आपस मैं लड़ते झगते रहते ही हैं पर आप मेरी ही बेटी को क्यों सबस अलग कर रहे हैं, प्रिंसिपल ने कहा नहीं वैषणवी का व्यवहार अलग है ये आम बच्चों जैसा व्यवहार नहीं करती, आप इसको एक बार कहीं दिखा लीजिये , इस पर राज को गुस्सा आ गया उसने कहा की आपको वैष्णवी को रखना न हो तो मना कर दें पर फालतू की राय न मुझे दें और न बनाएं,  

उस दिन स्कूल स घर आते वक़्त राज को हर तरफ निराशा के बदल दिख रहे थे वो हर पल अपने मन को समझाता रहा कि ऐसा कुछ नहीं है मेरी बच्ची वैसी ही है जैसी सबकी होती है पर अगले ही पल उसको निराशाओं का सागर fफिर से घेर लेता , इसी कश्मकश मैं वो ये भी भूल गया की उसको ऑफिस जाना था और वो घर पहुंच गया था , घर पहुंच कर उसने स्मिता का हाथ पकड़ा और दुसरे कमरे मैं ले गया , स्मिता बहुत ही हिम्मत वाली थी उसने राज के बताये हुए माजरे पर फिर से हॅसते हुए कहा कि तुम क्यों इतना परेशान होते हो ऐसा कई बार होता है मैं वैष्णवी को अच्छे से पालूंगी और उसको कुछ नहीं हुआ है, घर मैं सबसे छोटी है इसीलिए थोड़ा सा जिद करती है गुस्सा हो जाती है , 

सब चलता रहा पर समय के साथ राज और स्मिता को समझ मैं आने लगा था की कुछ तो वो हो रहा है जो वो समझना नहीं चाहते थे, दोस्तों और रिश्तेदारों ने, मिलने जुलने वालों ने सबने सलाह दी की वैष्णवी को एक बार किसी मनोचिकिसक के पास ले जा कर दिखाओ हो सकता है कुछ दवाएं मात्र से ही वो ठीक हो जाएगी , पर राज और स्मिता सपने मैं भी वो नहीं सुनना चाहते थे जिसका आभास उन्हें पहले से था, 

एक दिन उनके एक रिश्तेदार अपने मनोचिकित्सक दोस्त को लेकर आये और उन्होंने वैष्णवी से बात करके और उसको देखकर राज के कंधे पर हाथ रखा और कहा की आप जैसा सोच रहे है सच वो ही है आप मेरे क्लिनिक पर आइये हम इसके अच्छे इलाज के लिए कुछ प्रयत्न करते हैं 

वो दिन वो पल और राज की बंद आँखों से न जाने कैसे एक एक सपना एक एक आंसू के रूप मैं रिस रहा था, किसी भी पिता के लिए ये सुनना  एक आसमान गिरने जैसा होता है, डॉक्टर के शब्द बार बार उसके कानों मैं गूँज रह थे और जिसका शोर दोनों हाथों से कानो को बंद करने के बाद भी नहीं जा रहा था, घर मैं हर आदमी से नजर बचा कर निकल जाना चाहता था और रोना चाहता था किसी एक ऐस कोने मैं जहाँ उसे कोई नहीं देख सके,  उड़ेल देना चाहता था अपने जज्बातों के सागर को ताकि वो कुछ हल्का हो सके पर वो बात शायद उससे कहीं ज्यादा भारी थी ,

सहरसा उसने महसूस  किया उसके कंधे पर किसी ने हाथ रखा , पलट के देखा तो भीगी आँखों से स्मिता  ने गर्दन को न मैं हिलाते हुए राज  को अपने सीने से लगा लिया और समझाया की वो शायद हम ही हैं जिसमें ये क्षमता भगवान ने देखी होगी कि हम इस बच्ची को वो प्यार, वो दुलार, वो परवरिश दे सकते हैं इसलिए इसके अच्छे के लिए हम प्रतिबद्ध होना पड़ेगा , मन को मजबूत करना पड़ेगा और इसके भविष्य के लिए एक दूसरे का सहारा बनना पड़ेगा, स्मिता की इस बात ने राज को इतना मजबूत कर दिया की जैसे एक पल पहले बेमकसद सी लगने वाली दुनिया में जीने का  मकसद मिल गया हो ,

आज  जब वैष्णवी १८ साल की हो चुकी है पर आज भी उतनी मासूम, निश्चल है जैसे वो ५ साल की उम्र मैं हुआ करती थी, उसकी दुनिया भी राज, स्मिता और उसको समझने वाले ,उससे उसकी जैसी बात करने वालों तक ही सीमित है, और वो चाहती भी नहीं है की उसकी इस छोटी सी दुनिया को कोई बड़ा कर दे और उसके मम्मी पापा को बाँट ले ,

"राज और स्मिता की कहानी ये बताती है की सपना टूटना हौंसला टूटना नहीं है, टूटे सपने को जोड़ कर फिर से एक सपना देखा जा सकता है, हो सकता है की सपने की सूरत बदल जाए पर उम्मीदों  के पैमानें  नहीं बदलने चाहिए"   

 -राहुल गोविल -

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